Kamrunag Dev Tample Mandi H.P. ( देव कमरुनाग: मंडी हि. प्र. )

Kamrunag; rohanda mandi h p (कमरुनाग; रोहांडा मंडी हि प्र


हिमाचल प्रदेश देव भूमि है, यहाँ के देव स्थान के दर्शनों की अभिलाषा रखने वाला हर शख्स कमरुनाग जरुर जाना चाहता है. यह महाभारत कालीन स्थल के रूप में विख्यात है. कमरुनाग जाने के लिए सबसे पहले रोहांडा जाना पड़ता है. रोहांडा से ही सबसे आसान रास्ता है, वैसे थुनाग और शिकारी से भी पैदल ट्रेक है. रोहांडा के लिए बसें उपलब्ध है, जो शिमला से वाया तातापानी, चिंडी और पांगना होते हुए 133 km. चंडीगढ़ से जाना हो तो 160 km. सुंदरनगर है, वहां से 35 km रोहांडा. रोहांडा से लगभग 6 km पैदल. कमरुनाग समुद्र तल से 10,500 फुट की ऊंचाई पर स्थित है. पैदल रास्ता अधिक कठिन नहीं है, कोई भी सामान्य चलने वाला आदमी तीन से चार घन्टे में पहुँच जाता है. अगर आप पहाड़ पर चलने के आदी हैं तो सिर्फ ढाई घंटा ही काफी है.  

                                                                सुबह 6.15 बजे

                                                              Prince द्वारा लिया गया चित्र

ये तो थी स्थिति. अब बात करते हैं देव कमरुनाग और कमरुनाग झील की. महाभारत के युद्ध की गाथा में एक कहानी आती है, बर्बरीक अथवा बबरू भान की जिसे रत्न यक्ष के नाम से भी जाना है. वह अपने समय का अजेय योधा था, उसकी भी इच्छा थी कि वह महाभारत के युद्ध में हिस्सा ले. जब उसने अपनी माता से युद्ध भूमी में जाने की आज्ञा लेनी चाही, तो माँ ने एक शर्त पर आज्ञा दी, कि वह उस सेना की ओर से लडेगा जो हार रही होगी. जब इस बात का पता श्री कृष्ण को चला, तो उन्होंने बर्बरीक की परीक्षा लेने की ठानी. क्योंकि कृष्ण को पता था हर हाल में हार तो कोरवों की ही होनी है. कृष्ण ने ब्राह्मण का वेश धारण किया और बर्बरीक से मिलने जा पहुंचे. उसके तरकश में सिर्फ तीन तीर देख कर कृष्ण ने ठिठोली की, कि बस तीन ही बाण से युद्ध करोगे. तब बर्बरीक ने बताया कि वह एक ही बाण का प्रयोग करेगा और वह भी प्रहार करने के बाद वापिस उसी के पास आ जायेगा. यदि तीनो बाणों का उपयोग किया तो तीनो लोकों में तबाही मच जाएगी. श्री कृष्ण ने उसे चुनौती दी कि वह सामने खड़े पीपल के पेड़ के सभी पत्तों को भेद के दिखाए. जैसे ही बर्बरीक ने बाण निकाला, कृष्ण ने एक पत्ता अपने पैर के निचे दबा दिया. कुछ ही क्षणों में उस बाण ने सभी पत्ते भेद कर, जैसे ही कृष्ण के पैर की तरफ रुख किया, तो कृष्ण ने जल्दी से अपना पैर हटा दिया. अब कृष्ण ने अपनी लीला रची और दान लेने की इच्छा जाहिर की. साथ ही वचन भी ले लिया कि वह जो भी मांगेंगे, बर्बरीक को देना पड़ेगा. वचन प्राप्त करते ही कृष्ण ने अपना विराट रूप धारण किया तथा उस योधा का सिर मांग लिया, बर्बरीक ने एक इच्छा जाहिर की, कि वह महाभारत का युद्ध देखना चाहता है. तो श्री कृष्ण ने उसका कटा हुआ मस्तक, युद्ध भूमि में एक ऊँची जगह पर टांग दिया, जहाँ से वह युद्ध देख सके. कथा में वर्णन आता है कि बर्बरीक का सिर जिस तरफ भी घूम जाता था, वह सेना जीत हासिल करने लग जाती थी. ये देख कर कृष्ण ने उस का सिर पांडवों के खेमे की ओर कर दिया. पांडवों की जीत सुनिश्चित हुई. युद्ध की समाप्ति के बाद कृष्ण ने बर्बरीक को वरदान दिया कि तुम कलयुग में श्याम खाटू के रूप में पूजे जाओगे, और तुम्हारा धड़ (कमर) कमरू के रूप में पूजनीय होगी.

                                                  कमरुनाग देव और कमरुनाग झील के दर्शन

                                                 देव कमरू की पत्थर से निर्मित मूर्ति (मोहरा)
                         
                                     प्रिन्स सन्दीप सिंह, मधु कँवर, यशदीप सिंह कँवर, देव कमरू के सानिध्य में

आज खाटूश्यामजी, राजस्थान के सीकर जिले में स्थित है. और कमर (धड़) यहाँ पहाड़ी पर देव कमरुनाग के रूप में स्थित है. बाद में जब पांडव यहाँ से अपनी अन्तिम यात्रा के दौरान गुजरे तो, वह कमरू से मिलने के लिए रुके. जब कमरू ने कहा कि उन्हें प्यास लगी है, तब भीम ने अपनी हथेली का वार धरती पर किया, और वहाँ एक झील उभर गयी, जो आज कमरुनाग झील के नाम से विख्यात है. पांडवों के पास जो भी गहने थे वो इस झील में फैंक कर, फूलों की घाटी की ओर प्रस्थान कर गये. आज भी यह परम्परा है, जो भी यहाँ जाता है वह सोना-चाँदी, गहने, सिक्के इस झील को अर्पित करते है. यहाँ के पुजारी Hans Raj बताते हैं कि यह झील पाताल लोक तक गहरी है, और इसमें कई अरब का खजाना समाहित है. कई बार चोरों ने इसे लुटने की कोशिश भी की, यहाँ तक कि अंग्रेजों भी लुट के इरादे लेकर यहाँ आये थे. मगर जो भी इस नीयत से आया वह अँधा हो गया, और कुछ भी हासिल न कर पाया. पुजारी ने यह भी बताया कि देव कमरुनाग, यहाँ किसी भी तरह की दखलंदाजी पसन्द नहीं करते. ऐसे ही जब 9 जुलाई 1994 को एक जहाज इसके ऊपर से उड़ान भर रहा था, जिसमे पंजाब व् हिमाचल के राज्यपाल, अपने बेटे व् कुछ और लोगों के साथ थे, तो वह झील के ऊपर पहुँचते ही दुर्घटना ग्रस्त हो कर, अगली ही पहाड़ी पर गिर कर नष्ट हो गया. उस जहाज के अवशेष अभी भी देखे जा सकते हैं.

यही सब पढ़ सुन कर बहुत इच्छा थी इस स्थान को देखने की. हम परिवार सहित 25 जुलाई 2015 को शाम के 5.30 बजे रोहांडा पहुँच गये. यहाँ sandeep panwar का यात्रा लेख काम आया. जिसमे उन्होंने बताया था की रोहांडा में मात्र एक ही गेस्टहाउस है. सबसे पहले कमरे का इंतजाम किया. हमें दो कमरे मिल गए. चार ही कमरों का गेस्टहाउस है. इसकी निचली मंजिल में एक ढाबा है, जहाँ अच्छा खाना मिल जाता है. जब हम यहाँ पहुंचे, तो काफी सारे लोग गाड़ियों से आ रहे थे, और सीधे ही यात्रा पर अग्रसर हो रहे थे. मगर हमारा इरादा सुबह ही जाने का था. हम रात को कभी भी अनजाने रास्ते पर सफ़र नहीं करते. कहीं अगर रास्ता भटके तो फिर सारी रात जंगल में भी गुजारनी पड़ सकती है. वैसे भी हम सुबह करसोग से चले थे और शिकारी देवी के दर्शन कर पूरा जन्जैहली घूम कर 180 km से ज्यादा सफ़र कर के आये थे.

26 जुलाई 2015 को मोबाईल में सुबह चार बजे का अलार्म बजते ही उठ खड़े हुए. बाथरूम में गीजर लगा था. गर्म पानी से नहा कर अपना सारा सामान गाड़ी में रखा, क्योंकि अगर हम 12.00 बजे से पहले वापिस न आ पाते, तो गेस्टहाउस वाले को परेशानी हो सकती थी. सुबह-2 कॉफ़ी पीने की आदत है, मगर यहाँ तो आज चाय भी नसीब नहीं हुई. ठीक 5.00 बजे हमने कमरुनाग के लिए चढाई शुरू कर दी. रास्ता लगभग बढ़िया है चढ़ाई भी कुछ अधिक नहीं थी. हम आराम से बिना रुके दो किलोमीटर तक पहुँच गये, यहाँ एक पानी की टंकी है. बोतल में पानी भरा कुछ फोटो ली, फिर शुरू हो गये. बच्चे पूरी मस्ती में थे, कभी दौड़ कर आगे निकल जाते, कभी फोटो खींचते हुए पीछे रह जाते, उनकी इस मस्ती में, सफर का पता ही नहीं चल रहा था. तीन किलोमीटर के बाद एक टूटी-फूटी सराय मिली, जिसके खिड़की-दरवाजे गायब थे. अब हमें कुछ और भी लोग दिखने शुरू हो गए थे, कुछ हमसे आगे थे, और कुछ पीछे नजर आ रहे थे. कुछ लोगों से बात भी की. इनमे से अधिकतर लोग जिला हमीरपुर के थे. यह लोग कमरुनाग को अपना इष्ट मान कर हर साल यहाँ आते है. जब हम लगभग चार किलोमीटर तय कर चुके तो, इक्का-दुक्का लोग वापिस भी आने शुरू हो गए थे. ये वो लोग थे जो रात में ही ऊपर चले गये थे. इन्होने ही बताया कि आज दो दिन के बाद मौसम साफ़ है, झील पर धुन्ध भी काफी कम है. अब हम पांच किलोमीटर तय कर चुके थे. सुबह के 8.00 बजे थे, जब हमने सफ़ेद-स्लेटी रंग के पत्थरों से बने दो स्तम्भ देखे, जिस पर लिखा था, “मुख्य दरवाजा कमरुनाग”. हमें लगा अब तो हम पहुँच ही गए हैं, तभी किसी ने बताया कि अभी आधा घंटा और लगेगा. यहाँ से पत्थर का पक्का खड़ोंजा (रास्ता) है. कुछ देर चलने के बाद थोड़ी धुन्ध सी नज़र आ रही थी, और उसमे ही कुछ झण्डे जैसे दिख रहे थे. चंद कदम और चलने के बाद झील व् मंदिर नजर आ गया. चूँकि मेला ख़त्म हो चूका था, तो झील के किनारे लगने वाली चार-पांच दुकाने ही खुली थी. सबसे पहले चाय की दुकान पर जा कर चाय और बिस्कुट का आनन्द लिया, उसके बाद ही मंदिर की ओर रुख किया.

                                                                      दो किलोमीटर
                                                
                                                            तीन किलोमीटर सराय भवन

                                                                            कुछ और अन्दाज


प्रवेश से पहले उस आदेश का पालन किया, जो सामने बोर्ड पर लिखा था. “जूते यहाँ उतारें”. उसके बाद देव कमरू को प्रणाम किया. पत्नी जी और बच्चों ने धूप-दीप जलाया. मैंने कुछ चित्र लिए, पुजारी हंस राज से मन्दिर और झील के बारे में कुछ जानकारी हासिल की. मेरी खास याचना को देखते हुए देव कमरू की, पत्थर से निर्मित मूर्ति की तस्वीर लेने की आज्ञा प्रदान की. मगर शर्त थी की मंदिर की परिधि से बाहर, झील के किनारे से चित्र लिया जाए. यहाँ मेरे कैमरे के लेन्स ने अपना काम किया. शायद इससे पहले आपने कभी किसी फोटो में देव कमरुनाग के दर्शन नहीं किये होंगे. कमरुनाग का यह मंदिर लकड़ी के खम्बो पर बना हुआ है. कोई भी दीवार नहीं है, छत लोहे की चादरों से निर्मित है. जबकि धर्मशाला और अन्य मकान की छतें स्लेट की, और दीवारें पत्थर की है. इस मन्दिर के भवन का पुनः निर्माण 13 दिसम्बर 1963 को, देवता के गुर सवजू राम की देखरेख में संम्पन हुआ. जिस पुजारी महोदय ‘हंस राज’ से हमारी बातचीत हुई, वह इन्ही सवजू राम के परिवार के सदस्य है. इन्होने बताया की दिवाली के बाद जब यहाँ बर्फ पड़ जाती है, तो ये सभी लोग अपने घरों को लौट जाते है. जो कुराहड़ पंचायत के अंतर्गत आता है. उसके बाद यहाँ कोई नहीं होता. कमरुनाग खुद अपने खजाने की रक्षा करते हैं, जो झील के गर्त में दबा है. जब फ़रवरी में बर्फ पिघलने लगती है, तब यहाँ दोबारा लोगों की आमद शुरू हो जाती है. कुछ साहसी यात्री बर्फ में भी आते है.

अब कैमरे की आँख झील की ओर थी. हमने देखा झील में काफी मात्रा में काई तैर रही थी. जब इसके बारे में बात की, तो पता चला कि हर तीसरे साल, लकड़ी के तख्ते पर बैठ कर झील में जाते है, और इसकी सफाई की जाती है. झील में काफी संख्या में नोट भी तैर रहे थे, जबकि पास ही एक बोर्ड लगा था, कि कागज के नोट झील में मत डालें, सिक्के ही डाले. सिक्के पुजारी के पास उपलब्ध है. पर वाह री आस्था, ये सब पढ़ कर भी लोग नोट फैंक रहे थे. मैंने देखा मेरी पत्नी जी ने भी एक पचास का नोट झील के हवाले कर दिया. मैंने पुजारी से पूछा कि आप इन नोटों का क्या करते हो, तो उन्होंने बताया हम इसे बाहर निकलते हैं. तथा उसी मात्र में सिक्के झील में डाल देते हैं. जहाँ और मंदिरों में जब पुजारी, भिखारी बन चुके हैं, कमरुनाग में यह सब बड़ा अजीब सा लगता है.

                                                                      बस सिर्फ फोटो
                                                           
                                                                        झील में तैरते हुए नोट
                                         
                                               कमरुनाग झील से ऐसा दीखता है रोहांडा

                                             हिमाचल प्रदेश उच्च न्यालय की वजह आज यह कटने से बच जाएगा

अब से पहले यहाँ भी बकरों की बलि की प्रथा थी. मगर माननीय उच्च न्यालय हि प्र के हस्तक्षेप के बाद यह प्रथा बन्द हो चुकी है. फिर भी लोग जिन्दा बकरा कमरुनाग को भेंट कर ही जाते हैं. लगभग एक घंटा हमने यहाँ कमरुनाग के सानिध्य में गुजारा. तन्द्रा तब भंग हुई जब भूख का अलार्म बजा. खोखे वाले से खाने की बाबत पूछा, तो पता चला 12.00 बजे तक बनेगा. तब याद आया रोहांडा में पण्डित जी का ढाबा. 10.00 बजे कमरुनाग और 11.30 बजे रोहांडा में. सबसे पहले धावा बोला खाने पर, फिर कमरे की चाबी लेकर कपडे बदले. अब यात्री से पर्यटक का रूप धारण हो चूका था. 12.30 बजे रोहांडा को अलविदा कहा, अब अगली मंजिल थी पराशर झील.

                                 “जय देव कमरुनाग”


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