अमरनाथ यात्रा भाग - 8 (Amarnath) “ दोमेल से गुफा और वापिस”



24 – 30 June 2011

अमरनाथ यात्रा भाग - 8 (Amarnath) “ दोमेल से गुफा और वापिस”

श्रीनगर से कुदरत के नजारों को निहारते, कैमरे में कैद करते-2 शाम 5.00 बजे हम अमरनाथ की तलहटी ‘बालटाल’ में प्रवेश कर गये l बालटाल सिर्फ एक विशाल मैदान है जो वहां आने वाली गाड़ियों के लिए एक parking स्थल और हेलीकॉप्टरों के लिए त्वरित अड्डा है l यहाँ अगर आबादी है, तो वो है भारतीय सेना के वीर जवान l जो यहाँ स्थायी – अस्थायी चौकियों में बर्फ पिघलने से लेकर बर्फ पड़ने तक रहते हैं l शेष समय यहाँ बर्फ के सिवा कुछ नहीं होता l वैसे तो गाड़ियों के लिए यही स्थायी parking है, मगर हमारे पास शिव गौरी सिद्ध सेवा मंडल के पहचान पत्र थे, तो हमे आगे दोमेल तक जाने दिया गया l हमारे सेवा मंडल के पहुँचने से पहले ही बहुत सारे लंगर के पंडाल लग चुके थे l कुछ बन रहे थे, जो बन चुके थे उन पर तरह-2 की मिठाई चाय खाना इत्यादि सजे हुए थे l और सेवादार आने-जाने वालों को रोक कर खाने का आवाहन कर रहे थे l जब हम उस जगह पहुंचे जहाँ हमारे टेंट लगने थे तो वह जगह तो उजाड़ सी पत्थरों से भरी हुई थी l देवेंदर जी ने बताया की हर साल जब बर्फ गिरती है, उसके पिघलने के साथ ही काफी मात्र में मलबा भी पहाड़ से निचे गिर जाता है l हमारे सामान से लदे ट्रक अभी तक नहीं पहुंचे थे, हमने सवलिया नजरों से देवेन्द्र जी को देखा, तो वो बोले चिंता न करें सब इंतजाम हो जायेगा l जहाँ हमने गाड़ियाँ रोकी थी, उससे चन्द कदम पीछे चंडीगढ़ वालों का भंडारा लगा हुआ था, हम उसी ओर चले गये l वो लोग देवेन्द्र को जानते थे, उनमे एक सेवादार राजेंदर जी “ राजेन्द्र के सेवा भाव के विषय में आगे बताऊंगा “ ने कहा आप अपना सामान अन्दर रखिये, और आराम कीजिये l हमने वैसा ही किया, उन्होंने हमे एक कमरा दिया जहाँ हमने सामान रख दिया l हमे बड़े आदर के साथ चाय नाश्ता दिया गया l उसके बाद देवेंदर जी ने कहा चलो अब कुछ काम करते हैं l हमारे कुछ साथी आराम करने लग गये, और हम कुछ लोग अपने प्लाट में जहाँ टेंट लगने थे, सफाई में जुट गये l अँधेरा होने तक हमने काफी सफाई कर ली थी l वैसे तो यहाँ बिजली की तारें पहुँच गई थी, मगर अभी उनमे करंट नहीं था, तो सारा काम जेनरेटर के माध्यम से ही चल रहा था l यहाँ मैं बताना चाहता हूँ, कि सबसे बड़ा टेंट और भंडारे की सुविधा चंडीगढ़ सेवा दल की ही थी l यही एक भंडारा था जहाँ नहाने के लिए गर्म पानी के गीजर लगे हुए थे l 8.30 बजे हमने खाना खाया, और सोने के लिए अपने कमरे में जहाँ हमारा सामान पड़ा था चले गये l अब घर की याद आई तो फोन में नेटवर्क देखा सिर्फ एक ही डंडा था, फिर बाहर निकल कर देखा तो नेटवर्क पूरा था l माता जी से काफी देर तक बात की, वह चिंतित हो रही थी l “ वैसे यहाँ कई STD PCO भी थे, जहाँ से लोग अपने घरों को फोन कर रहे थे l “ जैसे -2 अँधेरा बढ़ रहा था ठण्ड के साथ -2 नदी का शोर भी बढ़ रहा था l कब नींद आई पता ही नहीं चला,
सुबह 5.00 बजे जय भोले का स्वर सुन कर नींद खुली, तो देखा, सबको bed tea दी जा रही थी l हमने सबसे पहले हाथ-मुंह धोया ब्रश किया उसके बाद ही चाय पी l जब हम अमरनाथ गुफा की यात्रा की तैयारी शुरू कर रहे थे तो मालूम हुआ, कुछ गड़बड़ है, इसलिए यात्रा तय दिन 29 जून को ही शुरू होगी l अब क्या करते फंस गये 5 दिनों तक l अब कर भी क्या सकते थे, सिवा अपने साथियों को कोसने के, जिन्होंने हमे वैष्णो देवी नहीं जाने दिया l जी भर के कोसा और वो मुंडी झुकाए सुनते रहे l अब और तो कुछ कर नहीं सकते थे, चलो फिर प्लाट साफ़ किया जाए l

अमरनाथ यात्रियों के लिए टेंट की व्यवस्था :

 10.30 बजे हमारे दो ट्रक और कुछ लोग पहुँच ही गये, मगर जिन ट्रकों में टेंट का सामान था, वह 12.00 बजे पहुंचे l उसके बाद शुरू हुआ ढारा बनाने का काम l शाम तक रसोई घर और एक छोटा टेंट लग चुका था l हम उस रात भी वहीँ ठहरे जहाँ कल थे l दुसरे दिन चंडीगढ़ वाले राजेंदर जी को पता चला, कि मेरी पत्नी madhu स्वास्थ्य विभाग से हैं, तो उन्होंने पूरी डिस्पेंसरी सम्भाल दी l अब अगले चार दिन बस यही काम था, अपने भंडारे में मैं डॉक्टर बन गया और चंडीगढ़ वाले में मधु l अब हमारे साथियों को यहाँ भी जल्दी लगी, और वह हमे बताये बिना सुरक्षा घेरे से किसी तरह 27 जून को निकल गये l बाद में पता चला कि दो दिन रास्ते में उनकी क्या हालत हुई l

अमरनाथ यात्रा का शुभारम्भ :

 29 जून को सुबह 5.00 बजे हम सब, मैं और madhu, पं हेम दत्त जी उनकी पत्नी और समधन देवेन्द्र उनका बेटा और खुशिनंदन, अपने साजोसामान के साथ चढ़ाई करने को तैयार थे l निकलते ही आगे army camp था, सबकी चेकिंग हुई और आखिर यात्रा शुरू हो ही गई l रास्ता काफी चौड़ा है, इसी रास्ते से घोड़े वाले, पालकी वाले और पैदल एक साथ चल रहे थे l जहाँ कहीं रास्ता थोडा तंग होता तो किसी न किसी को रुकना पड़ता था l यहाँ पैदल चलने वालों को बहुत सावधानी बरतनी पड़ती है, वरना कभी भी घोड़े या पालकी से धक्का लग सकता है l अभी तीन किलोमीटर ही गये थे की बैटरी ख़त्म l कैमरे की भी और मेरी भी l अभी तो 11 km. और था l हालत खराब हो गई, 100 मीटर चलता, फिर बैठ जाता l जहाँ रास्ता समतल आता वहां स्पीड तेज हो जाती थी l जब हम शुरू में चले थे तो ऊपर काफी दूर तक रास्ता और उस पर चलने वाले लोग नजर आ रहे थे l सामने देख कर ऐसा लगता था, बस ये पहाड़ी ख़त्म होते ही, जैसे अमरनाथ गुफा आ जाएगी l परन्तु जैसे ही एक पहाड़ी का किनारा ख़त्म होता तो बिल्कुल वैसा ही दृश्य आगे दिखाई देता, ऐसा लगभग 6 या 7 बार हुआ l अब रास्ता काफी समतल था l बराडी नामक जगह पर अमरनाथ गुफा तक जाने के दो रास्ते आते हैं, एक को शार्टकट कहते हैं, जबकि दूसरा संगम घाटी से होता हुआ जाता है l इसी रास्ते में आगे जाकर पंचतरनी से आने वाले लोग भी मिलते हैं l इनमे कुछ हेल्कोप्टर से आने वाले होते हैं और बाकि पहलगाम की ओर से आने वाले l शार्टकट वाले रास्ते से आर्मी वाले जाने नहीं दे रहे थे, कारण रात भर बारिश की वजह से वह फिसलन भरा हो गया था l मजबूरन हमे संगम होते हुए ही जाना पड़ा l यहाँ से संगम तक लगातार उतराई है l जब हम संगम पहुंचे तो यहाँ की खूबसूरती देख कर सारी थकान दूर हो गई, मगर जब सामने ऊपर की ओर रास्ता देखा तो वह खड़ी चढ़ाई होश उड़ाने के लिए काफी थी l संगम वह जगह है, जहाँ पंचतरनी से आने वाली नदी अमरगंगा में मिलती है l नदियों के इसी संगम के कारण इस जगह को संगम कहते हैं l हमने संगम में रुक कर कुछ चाय नाश्ता किया, और ‘बम-बम भोले’ का जय घोष करते हुए, अपने लड़खड़ाते शारीर को, चढाई के हवले कर दिया l हम देख पा रहे थे कि घोड़े पर बैठे हुए लोग भी इस चढ़ाई में परेशानी महसूस कर रहे थे l कुछ लोग जो पहले भी यात्रा कर चुके थे ने बताया कि शुक्र है बारिश की वजह से आज धुल नहीं है, वरना शाम तक आदमी अपनी शक्ल भी नहीं पहचान सकता l संगम से ऊपर चोटी तक पांच कैंची मोड़ हैं ये रास्ता हमने कैसे पार किया, यह सोच कर आज भी टाँगें कांपने लगती है l जैसे ही चढाई ख़त्म हुई तो देखा, दाहिनी ओर से भी लोगों की काफी भीड़ आ रही है, यह रास्ता पंचतरनी से आता है l पंचतरनी तक लोग पहलगाम से और हेलीकाप्टर से आते हैं l अब यहाँ से गुफा नजर आना शुरू हो गई थी, मगर अभी भी पांच km. रास्ता ग्लेशियर के ऊपर से गुजरते हुए तय करना बाकी था l रास्ता सीधा था तो हमारी चाल भी तेज थी l करीब 3 km. के बाद अब भंडारे वालों के टेंट, और निजी टेंट, जो अधिकतर बर्फ के ऊपर ही लगे थे l खाना-पीना, सोना-बैठना सब बर्फ के ऊपर, यह एक अद्भुत अनुभव है l आगे बढे तो दर्शनार्थियों की लाइन देख कर हम भी कतार में लग गये l अब तक दिन के 12.00 बज चुक थे महिलाओं की अलग कतार और पुरषों की अलग l हम भी उसी व्यवस्था में खड़े हो गये l लाइन में खड़े-2 हमें 3.30 बज गये मगर कतार आगे ही नहीं बढ़ रही थी, जो लोग घोड़े या पालकी में थे, वह फटाफट आ जा रहे थे l इसी दौरान हमारी महिलाएं परेशान हालत में ढूंढते हुए हम तक पहुंची, और बताया की वह तो कब की दर्शन कर चुकी है l फिर जब फंडा समझ में आया तो हम भी अपनी महिलाओं के साथ उनकी लाइन में आगे बढ़ गये, उनके सहारे हम वहां तक पहुँच गये, जहाँ से फाइनल चेकिंग के बाद लोग आगे जा रहे थे l जब आगे बढे तो सामने एक विशाल गुफा भूरे स्लेटी रंग के पत्थरों द्वारा स्वनिर्मित लाल-पीले झंडों से सुसजित थी l यह दृश्य ही इन्सान को संज्ञा शून्य कर देता है l सीढियाँ चड़ने से पहले जूते उतार कर जैसे ही कदम आगे बढ़ाये, तो बर्फ जैसे ठन्डे पत्थरों ने पैर सुन कर दिए, और ठंडक का अहसास तालू तक महसूस होने लग गया l इस से आगे कैमरा वगेरह मान्य नहीं है, हमें बताया गया की कैमरे की फ्लेश के कारण जो गर्मी उत्पन होती है, उससे हिम शिवलिंग के पिघलने का खतरा है l इसी कारण सीढियों के ऊपर अब कहीं कोई जेनरेटर भी नहीं लगता है l थोड़ा ऊपर जा कर दो रास्ते हैं, दांई ओर से लोग जा रहे थे, और दर्शन कर बाँई ओर से निचे आ रहे थे l यहाँ सुरक्षा इतनी चाक-चौबंद है, कि हर दस कदम पर सुरक्षा कर्मी मौजूद रहता है l जब हम सीढ़ी चढ़ कर ऊपर पहुंचे तो सामने भोले शंकर हिमानी शिवलिंग के रूप में लगभग 12 फूट तक की ऊँचाई में स्थापित थे l लोग ‘बम-बम भोले’ और ‘जय भोले’ का उदघोष कर रहे थे l इसी दौरान एक कबूतर का जोड़ा फड़फडाता हुआ गुफा के पास उड़ने लगा, सभी की नजर उस ओर चली गई, और ‘हर-हर महादेव’ का स्वर गुफा के अन्दर गूंजने लगा l “कहते हैं जिस किसी को यह अमर कबूतर नजर आ जाते हैं, उसकी यात्रा सफल हो जाती है” l अब यह वही अमर कबूतर थे, या नहीं यह तो भोले बाबा ही जाने l अब पीछे से इशारा हुआ जल्दी आगे बढ़ो l आगे छोटे -2 ताज़ी बर्फ के जैसे दो और ढेर पिरामिड के आकार में विराजमान थे, इन्हें पार्वती और गणेश बताया जाता है l इसके साथ ही बिलकुल कोने में बाँई और एक कुआ सा बना हुआ है, जिसमे से पानी बहकर निचे जा रहा था l निचे एक पाइप लगा हुआ था, जहाँ से लोग बोतलों में पानी भर कर भोले के प्रसाद के रूप में अपने घरों को ले जा रहे थे l गुफा के अन्दर की सभी चीजों को लोहे की जाली से कवर किया गया है, ताकि कोई उसे हाथ लगा कर क्षति न पहुंचा सके l हमने देखा लोग यहाँ आकर बहुत भावुक हो रहे हैं, और जाली के अन्दर सिक्के व् नोट उछाल रहे हैं l एक आदमी ने तो अपने गले से सोने की चेन निकली, और भोले बाबा के चरणों में उछाल दी l

 अमरनाथ यात्रा से वापिसी :

अब हमने दर्शन कर लिए थे, बाकि लोगों को भी जगह चाहिए थी, सो हमने पानी की बोतलें भरी और वापिस आ गये l निचे हमारी साथी महिलाएं हमारा इंतजार कर रही थी l हमने कुछ प्रसाद इत्यादी लिया, और तय हुआ कि अब हम शॉर्टकट से जांएगे l चूँकि सुबह से हमने खाना नहीं खाया था, तो सबसे पहले एक भंडारे का रुख किया, कढ़ी-चावल का भोग लगाया l अब तक शाम के 7.00 बज चुके थे, सूरज की रौशनी मंद हो रही थी l रास्ता खतरनाक था, तो ग्लेशियर पार करते हुए आखिर उस पगडण्डी तक पहुँच ही गये, जो कई जगह इतनी संकरी है, की एक समय में एक ही आदमी पार कर सकता है l हमारे पास टॉर्च थी, इस लिए ज्यादा मुश्किल नहीं आ रही थी l थोड़ी सी चढाई चौपाया होकर तय करनी पड़ी, फिर कुछ रास्ता समतल था, बाकि लगातार उतराई उतरते हुए जब हम दोमेल पहुंचे तो रात के 12.00 बज चुके थे l अब समस्या ये थी रुकेंगें कहाँ l लगभग सभी भंडारे बंद हो चुके थे l हम पांच लोग थे, हमने सलाह की कि चल कर गाड़ी में बैठते हैं, क्योंकि चाबी अभी भी मेरी जेब में थी l हम गाड़ी की ओर बढ़ ही रहे थे कि चंडीगढ़ वाले भंडारे के राजेन्द्र जी ने हमे देख लिया, वो भी सोने की तैयारी कर ही रहे थे, उन्होंने आवाज देकर बुलाया ‘भोले’ कहाँ जा रहे हो, अन्दर आ जाओ l जबकि अन्दर कहीं पैर रखने की भी जगह नहीं थी l अब सेवा भाव देखिये उन्होंने रसोई घर में सोये अपने सेवादारों को उठाया, और हमे सोने की जगह दे दी l हमने कहा अब आप कहाँ सोयेंगे, वह बोले हमारी चिंता न करें l उन लोगों ने एक -2 चद्दर ली और सब्जी की बोरियों को अपना बिस्तर बना लिया l ये देख कर हमे बड़ी ग्लानी महसूस हो रही थी, मगर उन सभी के चेहरों पर सुकून था l
चूँकि हम रसोई में सोये थे, इस लिए सुबह चार बजे उठ गये l उस के बाद नहा धोकर चाय नाश्ता किया, और उन सभी लोगों से विदा ली, जिनके साथ हमने यहाँ पांच-छ: दिन गुजारे थे l अब हमारी रफ़्तार देखिये 30 जून 2011 को सुबह 8.00 बजे दोमेल से चले और 1 जुलाई 2011 को सुबह 8.00 बजे अपने घर कसौली में थे l

                                              सुबह के 5.30 बजे पहले जत्थे के साथ

                                       ऊपर से निचे ग्लेशियर से बहता पानी

                                       पैदल, पालकी, घोड़ा : सबको अमरनाथ के दर्शन की जल्दी

                                    एक घाटी खत्म होती है तो दूसरी आ जाती है - अनवरत सिलसिला

                                                       4 फूट से 10 फुट तक चौड़ा रास्ता

                                                   मधु जी ने भीड़ में मुझे पकड़ ही लिया

                                  अब हिमालय की चोटियाँ काफी नजदीक लगने लगी है

                                        10 गढ़वाल राइफल जिसका नारा है जय बद्री विशाल


                                         जय बाबा बर्फानी, भूखे को अन्न प्यासे को पानी




1. अमरनाथ यात्रा भाग - 1 “Amarnath yatra part – 1”
2. अमरनाथ यात्रा भाग - 2 “ कसौली से मानेसर lake”
3.अमरनाथ यात्रा भाग-3 “मानेसर lake से श्रीनगर”
4. अमरनाथ यात्रा भाग –4 (AmarnathYatra-4) “श्रीनगर” (Srinagar)
5. अमरनाथ यात्रा – 5 “खीर भवानी” (Kheer Bhawani)
6. अमरनाथ यात्रा भाग –6 “ कंगन; गंदरबल”
7. अमरनाथ यात्रा भाग –7 (Sonamarg) “सोनमर्ग”
8. अमरनाथ यात्रा भाग -8 (Amarnath) “ दोमेल से गुफा और वापिस”

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